इंदिरा एकादशी व्रत 2020 व कथा INDIRA EKADASHI VRAT 2020

इंदिरा एकादशी व्रत 2020 व कथा INDIRA EKADASHI VRAT 2020

इंदिरा एकादशी व्रत 2020 में 13 सितम्बर 2020 दिन रविवार को पड़ रहा है

इन्दिरा एकादशी व्रत वर्ष 2020 में  रविवार, सितम्बर 13, 2020 को
14  सितम्बर 2020  सोमवार  को परायण , पारण (व्रत तोड़ने का) समय – सूर्योदय से पुरे दिन
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 12 सितम्बर 2020 को रात्रि 11 :24 PM   बजे से प्रारंभ होकर 
एकादशी तिथि समाप्त – 13 सितम्बर 2020 को रात्रि 10 :57 PM तक
   जिस दिन एकादशी तिथि सूर्य उदय होने के समय होती है एकादशी व्रत उसी दिन रहते है इसीलिए  इंदिरा एकादशी व्रत २०२० में 13 सितम्बर 2020 रविवार  को पड़ेगा |

हिंदू पंचांग के अंतर्गत प्रत्येक माह की 11वीं तीथि को एकादशी कहा जाता है। एकादशी को भगवान विष्णु को समर्पित तिथि माना जाता है। एक महीने में दो पक्ष होने के कारण दो एकादशी होती हैं, एक शुक्ल पक्ष मे तथा दूसरी कृष्ण पक्ष मे। इस प्रकार वर्ष मे कम से कम 24 एकादशी हो सकती हैं, परन्तु अधिक मास की स्थति मे यह संख्या 26 भी हो सकती है।

अधिक जानकारी के लिए इस विडियो को देखे 

एकादशी के व्रत का सम्वन्ध तीन दिनों की दिनचर्या से है। भक्त उपवास के दिन, से एक दिन पहले दोपहर में भोजन लेने के उपरांत शाम का भोजन नहीं ग्रहण करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले दिन पेट में कोई अवशिष्ट भोजन न बचा रहे। भक्त एकादशी के दिन उपवास के नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं। तथा अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास समापन करते हैं। एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित होता है।

जो लोग किसी कारण एकादशी व्रत नहीं रखते हैं, उन्हें एकादशी के दिन भोजन में चावल का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा झूठ एवं परनिंदा से बचना चाहिए। जो व्यक्ति एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है, उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है।

एकादशी व्रत की तिथियाँ वैष्णव सम्प्रदाय के अलग-अलग अनुयायियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती  हैं।

इंदिरा एकादशी व्रत कथा INDIRA EKADASHI VRAT 2020

 

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा फल क्या है? सो कृपा करके कहिए। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अ‍धोगति से मुक्ति देने वाली होती है। हे राजन! ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनो। इसके सुनने मात्र से ही वायपेय यज्ञ का फल मिलता है। प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया। सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो। मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूँ। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में ‍कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इतना सुनकर राजा कहने लगा कि हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए। नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा। हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, ‍पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें। रात में भगवान के निकट जागरण करें। इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें। नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे। इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए। नारदजी के कथनानुसार राजा द्वारा अपने बाँधवों तथा दासों सहित व्रत करने से आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया। राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गया। हे युधिष्ठिर! यह इंदिरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा।

 

 

वर्ष 2020 में पड़ने वाली अन्य एकादशी व्रत को आप देख सकते है 

इंदिरा एकादशी – महत्व और अनुष्ठान

इंदिरा एकादशी सबसे महत्वपूर्ण और धार्मिक हिंदू त्योहारों में से एक है जो भगवान विष्णु की पूजा करने के लिए है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह त्यौहार भाद्रपद या अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष के दौरान ग्यारहवें दिन (एकादशी) पर मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह त्यौहार सितंबर या अक्टूबर के महीने में मनाया जाता है।

यदि एकादशी पितृ पक्ष में आती है तो इसे एकादशी श्राद्ध भी कहा जाता है क्योंकि यह पक्ष पूर्वजों की पूजा करने और प्रार्थना करने के लिए समर्पित है। इंदिरा एकादशी उपवास और भगवान विष्णु की पूजा करने के पीछे प्राथमिक उद्देश्य सभी पिछले पापों की क्षमा मांगना है। इस त्यौहार में भी बहुत महत्व है क्योंकि यह मृत पूर्वजों को मोक्ष देने में मदद करता है।

इंदिरा एकादशी के अनुष्ठान

इंदिरा एकादशी की पूर्व संध्या पर, भक्त आमतौर पर इंदिरा एकादशी व्रत का पालन करते हैं। उपवास 24 घंटों की अवधि के लिए किया जाता है जो एकादशी से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक होता है।

  • उपवास के रूप में, भक्त एक बार भोजन का उपभोग करते हैं लेकिन यह भी सूर्योदय से पहले होना चाहिए। भक्त ब्राह्मणों को भोजन देने और भगवान विष्णु को प्रार्थना करने के बाद उपवास समाप्त करते हैं।
  • उपवास के दौरान पर्यवेक्षक (भक्त) दूध से बने उत्पाद और फलों का उपभोग कर सकते हैं।
  • इंदिरा एकादशी की पूर्व संध्या पर, पर्यवेक्षकों को भगवान विष्णु को खुश करने के लिए मंत्रों को पढ़ना और भजन गाने चाहिए।
  • ‘विष्णु सहस्रनाम’ को पढ़ना इस दिन बहुत शुभ माना जाता है।

इंदिरा एकादशी का महत्व

इंदिरा एकादशी का त्यौहार बहुत महत्व रखता है क्योंकि भक्त जो इंदिरा एकादशी उपवास का पालन करते हैं उन्हें समृद्धि व उनके पिछले पापों से राहत का आशीर्वाद मिलता है। भक्त पूर्वजों को शांति प्रदान करने के लिए इंदिरा एकादशी उपवास करते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह उपवास अश्वमेध यज्ञ के समान महत्व रखता है।

 

किंवदंती (कहानी)

किंवदंतियों के अनुसार, इंद्रसेन नामक एक महान, दयालु और शक्तिशाली राजा था। वह अपनी प्रजा की पर्याप्त देखभाल करता था। इस प्रकार, उन्हें एक ईमानदार राजा और भगवान विष्णु के उत्साही भक्त के रूप में बहुत अधिक मान्यता प्राप्त की। एक बार, नारद मुनी इंद्रसेन के राज्य में गये और राजा को उनके पिता की मृत्यु के बाद की दयनीय स्थिति के बारे में बताया।

नारद मुनी ने इंद्रसेन से कहा कि उनके पिता यमराज साम्राज्य में रहते हैं जहां वह अपने पिछले पापों के कारण पीड़ित हैं। नारद मुनी ने अपने पिता का एक संदेश बताया कि इंद्रसेन को इंदिरा एकादशी उपवास के साथ-साथ ब्राह्मणों को दान करना चाहिए ताकि वे अपने पिता को अपने पिछले पापों से मुक्त कर सकें और उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद कर सकें।

नारद मुनी ने राजा को उपवास के अनुष्ठानों को समझने और इसे कैसे करना है इसमें मदद की। राजा इंद्रसेन ने इंदिरा एकादशी उपवास को किया जैसे कि नारद मुनी द्वारा समझाया गया था और अगले दिन इसे समाप्त कर लिया। उसी क्षण, राजा ने देखा कि उसके पिता भगवान विष्णु के निवास की ओर बढ़ रहे हैं और उनके ऊपर फूल बरस रहे हैं। न केवल राजा के पिता ने मोक्ष प्राप्त किया बल्कि राजा इंद्रसेना को इंदिरा एकादशी उपवास करने से कई योग्यताऐं हासिल हुईं क्योंकि उन्होंने बिना किसी बाधा के अपने शासक काल को जारी रखा। उस समय अवधि के बाद से, व्यक्ति और भक्त इंदिरा एकादशी उपवास का पालन बहुत खुशी, भक्ति और उत्साह के साथ करते हैं।

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