अजा एकादशी व्रत 2020, अजा एकादशी व्रत कथा एवं महात्म्य

अजा एकादशी व्रत 2020,Aja Ekadashi 2020 Date:

अजा एकादशी व्रत कथा एवं महात्म्य

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि को अजा एकादशी व्रत के नाम से जानते हैं वर्ष 2020 में भाद्रपद मास के

कृष्ण पक्ष की एकादशी 15 अगस्त 2020 दिन शनिवार को पड़ रहा है

एकादशी तिथि का प्रारंभ 14 अगस्त 2020 दिन शुक्रवार को सुबह 10:27 am पर हो रहा है और

एकदाशी तिथी का समापन 15 अगस्त 2020  शनीवार की सुबह 10:59 पर हो रहा है दिन शनिवार पड़ेगा जिस दिन

एकादशी तिथि सूर्योदय के समय होती है अर्थात उदया तिथि में जिस दिन एकादशी होती है उसी दिन एकादशी व्रत रहा जाता है।

अतः अजा एकादशी व्रत वर्ष 2020 में 15 अगस्त 2020 दिन शनिवार को मनाया जाएगा

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एकादशी व्रत का परायण

आइए हम अजा एकादशी व्रत की परायण के बारे में जाने अजा एकादशी व्रत का परायण 16 अगस्त 2020

की सुबह 10:57 तक ही रहेगा क्योंकि एकादशी व्रत का पारायण द्वादशी तिथि में ही हो जाता है और द्वादशी तिथि

16 अगस्त 2020 दिन रविवार को सुबह 10:57 तक रहेगी आप लोग 11:00 बजे के पहले ही सुबह ही परायण कर ले |

 

अजा एकादशी व्रत 2020

एकादशी का दिन भगवान विष्णु जी को प्रिय होता है। इस दिन उनकी आराधना की जाती है। साथ ही इस दिन लक्ष्मी

जी को भी पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अजा एकादशी व्रत से मनुष्य के समस्त प्रकार के पापों का नाश

हो जाता है। जो इसका व्रत करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णु लोक में पहुंच जाता है। इस व्रत का फल

अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में दान-स्नान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होता है।

अजा एकादशी व्रत की  विधि

1 . दशमी तिथि को सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।

2 . प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि करें।

3 . भगवान् विष्णु और माँ लक्ष्मी के नियम सहित पूजन करें।

4 . दिन भर निराहार रहते हुए शाम को फलाहार कर सकते हैं।

5 . इस व्रत में रात्रि जागरण करें।

6 . द्वादशी तिथि के दिन प्रातः ब्राह्मण को भोजन कराएं व दान-दक्षिणा दें।

7 . द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद उन्हें दान-दक्षिणा दें। फिर स्वयं भोजन करें।

अजा एकादशी व्रत कथा व महात्म्य

अजा एकादशी व्रत कथा पौराणिक काल में एक अत्यन्त वीर, प्रतापी तथा सत्यवादी हरिश्चंद्र नाम का चक्रवर्ती राजा राज्य

करता था। प्रभु इच्छा से उसने अपना राज्य स्वप्न में एक ऋषि को दान कर दिया और परिस्थितिवश उन्हें अपनी स्त्री और

पुत्र को भी बेच देना पड़ा। स्वयं वह एक चाण्डाल के दास बन गए। राजा ने उस चाण्डाल के यहाँ कफन लेने का काम

किया, किन्तु उन्होंने इस मुश्किल काम में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। जब इसी प्रकार कई वर्ष बीत गये तो उन्हें अपने

इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगे।  वह सदैव इसी चिन्ता में रहने लगे कि

मैं क्या करूं? किस प्रकार इस नीच कर्म से मुक्ति पाऊँ? एक बार की बात है, वह इसी चिन्ता में बैठे थे कि गौतम् ऋषि

उनके पास पहुंचे। हरिश्चन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख-भरी कथा सुनाई। राजा हरिश्चन्द्र की दुख-भरी कहानी

सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यन्त दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा- ‘हे राजन! भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम

अजा है। तुम उस एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करो तथा रात्रि को जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।’

महर्षि गौतम इतना कह कर चले गये। अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चन्द्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधानपूर्वक

उपवास तथा रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गये। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे

तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। उन्होंने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवेन्द्र आदि देवताओं को खड़ा पाया एवं अपने

मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजसी वस्त्र तथा आभूषणों से परिपूर्ण देखा। व्रत के प्रभाव से राजा को पुनः अपने

राज्य की प्राप्ति हुई।  वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब कौतुक किया था, परन्तु अजा एकादशी के

व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई और अन्त समय में हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को चले गए।

 

 

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