Pradosh vrat,प्रदोष व्रत कब है,अगस्त में पड़ने वाले प्रदोष व्रत

Pradosh vrat,प्रदोष व्रत कब है :-

आज हम आप लोगों को Pradosh vrat प्रदोष व्रत कब है और अगस्त महीने में पड़ने वाले प्रदोष व्रत के बारे में बताएंगे इस बार अगस्त महीने में तीन प्रदोष व्रत पड़ रहे हैं आइए जाने इन प्रदोष व्रतो का महत्व क्या है और प्रदोष काल कब है प्रदोष काल में पूजा का मुहूर्त कब है और व्रत का परायण कब करना है प्रदोष काल कब से शुरू होकर और कब तक रहेगा त्रयोदशी तिथि कब तक रहेगी

प्रदोष व्रत 1 अगस्त 2020 शनीवार

इस बार अगस्त महीने में तीन प्रदोष व्रत पड़ रहे हैं पहला प्रदोष व्रत 1 अगस्त 2020 दिन शनिवार को पड़ रहा था। जिसे शनि प्रदोष व्रत के नाम से भी जाना जाता है । जो भी प्रदोष व्रत शनिवार को पड़ता है तो शनिवार को पड़ने के कारण उसे शनि प्रदोष व्रत नाम दिया जाता है

 

प्रदोष व्रत  16 अगस्त 2020 रविवार

अगस्त महीने में पड़ने वाला दूसरा प्रदोष व्रत 16 अगस्त 2020 दिन रविवार को पड़ रहा है इसे रवि प्रदोष व्रत के नाम से भी जाना जाता है जो प्रदोष व्रत रविवार को पड़ते हैं उन्हें रवि प्रदोष व्रत के नाम से जानते हैं।

16 अगस्त 2020  दिन रविवार

को त्रयोदशी तिथी का प्रारम्भ

प्रातः 10:57AM से हो रहा है

त्रयोदशी तिथि की समाप्ति 17 अगस्त 2020 दिन सोमवार को सुबह 10:27 पर हो रहा है

त्रयोदशी तिथी  10:57 am बजे सुबह से पूरे दिन रहेगी ।जिस दिन  त्रयोदीशी तिथी संध्याकाल  के समय प्रदोष काल में रहता  है ,प्रदोष व्रत उसी दिन मनाते है और त्रयोदीशी तिथी 16 अगस्त को शाम को रहेगी

यही कारण है की प्रदोष व्रत 16 अगस्त 2020 दिन रविवार को पडेगा।

प्रदोष व्रत का पारायण 16 अगस्त 2020 दिन सोमवार को सुबह से पूरे दिन कभी भी कर सकते हैं

 

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प्रदोष व्रत 3

अगस्त महीने में पड़ने वाला तीसरा प्रदोष व्रत 30 अगस्त 2020 दिन रविवार को पड़ रहा है जो भी प्रदोष व्रत रविवार को

पढ़ते हैं रविवार को प्रदोष व्रत पड़ने के कारण वह रवि प्रदोष व्रत के नाम से भी जाना जाता है अतः यह रवि प्रदोष व्रत

कहा जाएगा क्योंकि या व्रत भी रविवार को पड़ रहा है।

 

 

पूजा विधि

दिन भर शुद्ध आचरण के साथ व्रत रखें और भगवान का ध्यान करते रहें और शाम को पूजा स्थान पर उत्तर या पूर्व की दिशा

में बैठ कर भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग की स्थापना करें और भगवान को गंगा जल, पुष्प, अक्षत, धतूरा, चंदन, गाय

का दूध, भांग, फल और धूप आदि अर्पित करें। इसके बाद ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करें। संभव हो तो शिव चालीसा

का भी पाठ करें। पूजन के पश्चात् घी के दीये से भगवान शिव की आरती करें और पूजा का प्रसाद सभी को वितरित करें।

इस दिन रात्रि को भी भगवान का ध्यान और पूजन करते रहना चाहिए। सुबह स्नान के बाद ही व्रत खोलें। व्रत से जुड़ी मान्यता

ऐसी मान्यता है कि प्रदोष के समय भगवान शिव शंकर कैलाश पर्वत के रजत भवन में होते हैं और नृत्य कर रहे होते हैं और इस

दौरान देवता भगवान के गुणों का स्तवन करते हैं। इस व्रत को करने वाले के सभी दोष समाप्त हो जाते हैं और मनुष्य का हर

प्रकार से कल्याण होता है। यह भी मान्यता है कि यदि यह व्रत सोमवार के दिन पड़ता है और जो भी इस व्रत को करता है उसकी

हर इच्छा फलित होती है। यदि यह व्रत मंगलवार को है तो व्रत करने वाले को रोगों से मुक्ति मिलती है, यदि यह व्रत बुधवार को है

तो सभी प्रकार की कामनाएँ पूर्ण होती हैं, यदि यह व्रत गुरुवार को है तो व्रत करने वाले के शत्रु का नाश होता है और सौभाग्य में

वृद्धि होती है, शुक्रवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को भ्रुगुवारा प्रदोष कहा जाता है। जीवन में सौभाग्य की वृद्धि हेतु यह प्रदोष किया

जाता है। यदि यह व्रत शनिवार को पड़ रहा है तो पुत्र की प्राप्ति होती है और यदि यह व्रत रविवार को पड़ रहा है तो व्रत करने

वाला सदा निरोग रहता है।

 

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